वाराणसी

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ओबीसी विभाग के प्रदेश उपाध्यक्ष एवं एडवाइजरी काउंसिल के सदस्य अशोक कुमार विश्वकर्मा ने एक विज्ञप्ति में बताया है कि भाजपा सरकार द्वारा मनरेगा का नाम बदलकर विकसित भारत गारंटी रोजगार आजीविका मिशन ग्रामीण करना पुरानी योजना की पहचान और प्रक्रिया को खत्म करने का राजनीतिक षड्यंत्र है। उन्होंने कहा की सरकार ने मनरेगा का सिर्फ नाम ही परिवर्तित नहीं किया है।बल्कि संपूर्ण प्रक्रिया को बदल करके डिजिटल कर दिया गया है। जिसके चलते आधार-बैंक लिंकिंग की खामियों के कारण गरीब मजदूर इस योजना से बाहर हो सकते हैं, केंद्रीय नियंत्रण बढ़ने और राज्य की स्वायत्तता घटने की आशंका है, तथा नाम बदलने से पारदर्शिता और जवाबदेही के नाम पर प्रक्रिया में बदलाव से मजदूरों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं। और मोबाइल ऐप से हाजिरी और पेमेंट्स में देर होगा। उन्होंने कहा कि मनरेगा एक स्थापित और सफल नाम था,जिसे बदलने से इसकी पहचान और दशकों की मेहनत पर असर पड़ सकता है। और नई योजना होने का भ्रम पैदा होगा। उन्होंने कहा कि नई व्यवस्था में आधार और बैंक खातों का ठीक से लिंक होना और मोबाइल ऐप से फोटो अपलोड करना ज़रूरी है। ऐसे में, जिनके पास स्मार्टफोन नहीं है या तकनीकी जानकारी कम है, वे मजदूर इस प्रक्रिया से बाहर हो सकते हैं। जिससे उनका काम रुक सकता है। यह बदलाव ग्रामीण रोजगार में केंद्रीय नियंत्रण बढ़ाएगा और राज्य सरकारों की भूमिका को कम करेगा। जबकि मनरेगा में विकेंद्रीकरण पर जोर था। डिजिटल व्यवस्था में मोबाइल ऐप से फोटो खींचकर हाजिरी लेने और पेमेंट करने की व्यवस्था दूरदराज के इलाकों के लिए मुश्किल है। जहां नेटवर्क कमजोर है या तकनीकी उपकरण (स्मार्टफोन) उपलब्ध नहीं हैं, वहां मजदूरों का काम करने के बाद भी भुगतान अटक सकता है।पुरानी मांग-आधारित प्रणाली की जगह अब आपूर्ति-आधारित योजना पर जोर दिया जा रहा है। जिससे गारंटी कम प्रभावी हो सकती है, भले ही रोजगार के दिन 100 से 125 दिन कर दिया गया है। यह बदलाव महात्मा गांधी के नाम को हटाने और पुरानी योजना की पहचान को खत्म करने की कोशिश है।
उन्होंने कहा नाम बदलने से व्यवस्था में पारदर्शिता के बदले गरीब और हाशिए पर पड़े मजदूरों के लिए डिजिटल और प्रशासनिक बाधाएं पैदा होगी, जो मूल योजना के उद्देश्य को कमजोर करेगी।




