लखनऊ

ऑल इंडिया यूनाइटेड विश्वकर्मा शिल्पकार महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक कुमार विश्वकर्मा ने एक विज्ञप्ति में कहा है कि आज देश भर में महंगी शिक्षा और महंगी किताबों के नाम पर चारों तरफ बड़े पैमाने पर ढोल पीटा जा रहा है।जबकि देशभर में स्थित उच्च शिक्षा संस्थान और बड़े बड़े नामी गिरामी हास्पिटल जहां खुले आम बडे़ पैमाने पर लूट मची है।जहां की सुविधा प्राप्त करने वाले मध्यम वर्गीय और गरीब आदमी के जमीन और जेवरात तक बिक जाते हैं। इस तरह के संस्थान को संचालित करने वाले राज सत्ता में बैठे राजनेता, मंत्री, सांसद, विधायक, भू माफिया तथा कॉरपोरेट और मीडिया जगत के लोग हैं। और इनके खिलाफ कोई आवाज न उठना आश्चर्यजनक है, जबकि आवाज इनके खिलाफ उठनी चाहिए। भारत में निजी क्षेत्र के उच्च शिक्षा और चिकित्सा का लगातार महंगा होना एक गंभीर चिंता का विषय है, जो इसे “जन-विरोधी” और “आम आदमी की पहुंच से दूर” बना रहा है। वास्तव में आवाज इसके खिलाफ उठानी चाहिए। शिक्षा और चिकित्सा अब एक सेवा न होकर बड़ा व्यवसाय या ‘कमोडिटी’ (वस्तु) बन गई है, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर और मध्यम वर्ग के लिए उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा प्राप्त करना सपना बनता जा रहा है। इसके पीछे प्रमुख कारण और जिम्मेदार सीधे तौर पर सरकार और उसकी नीतियां है। सरकारी शिक्षा और चिकित्सा प्रणाली में सुधार के बजाय, निजी संस्थानों को बढ़ावा दिया जा रहा है। जिसके चलते गरीब और मध्यम वर्ग पर उच्च शिक्षा और चिकित्सा के लिए अपनी जमीनें गिरवी रखनी पड़ रही हैं या कर्ज लेना पड़ रहा है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में परिवारों की आय का एक बड़ा हिस्सा शिक्षा पर खर्च हो रहा है।महंगी शिक्षा के कारण गरीब, दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के बच्चों के लिए मेडिकल, और इंजीनियरिंग जैसे बेहतरीन संस्थानों के दरवाजे लगभग बंद हो रहे हैं। भारी भरकम फीस देने के बाद भी अगर अच्छी नौकरी नहीं मिलती, तो छात्रों पर कर्ज का बोझ बढ़ जाता है, जिससे मानसिक तनाव और आत्महत्या जैसे मामले बढ़ रहे हैं। शिक्षा को व्यवसाय के रूप में बढ़ावा देने से सामाजिक असमानता बढ़ रही है। यदि सरकारी संस्थानों को मजबूत नहीं किया गया और शिक्षा को आम आदमी के लिए सुलभ नहीं बनाया गया, तो यह देश की युवा आबादी के भविष्य के लिए एक बड़ा खतरा साबित हो सकता है।





