वाराणसी

ऑल इंडिया यूनाइटेड विश्वकर्मा शिल्पकार महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक कुमार विश्वकर्मा ने विश्वकर्मा समाज के महान संत लोक कल्याण और परोपकार के प्रवर्तक स्वामी कल्याण देव जी की जयंती पर नमन करते हुए श्रद्धा सुमन अर्पित की है। उन्होंने कहा कि महान शिक्षाविद, समाज सुधारक, परोपकारी संत स्वामी कल्याण देव जी का जन्म जांगिड़ ब्राह्मण विश्वकर्मा कुल में 21 जून 1876 को बागपत जिले के कोताना गांव में हुआ था। अपने संन्यासी जीवन मे स्वामी जी ने 300 शिक्षण संस्थाओं का निर्माण कराया। साथ ही कृषि केन्द्रों, वृ़द्ध आश्रमों, चिकित्सालय, आदि का निर्माण कराकर समाज मे उन्होंने अपनी उत्कृष्ट सेवा की छाप छोडी। उन्हें सन २००० में भारत सरकार ने समाज सेवा के क्षेत्र में पद्म भूषण सम्मान से सम्मानित किया था। स्वामी कल्याण देव को बचपन में रामायण सुनकर वैराग्य हो गया। दस-बारह बरस की उम्र में साधु मंडली के साथ अयोध्या, काशी, प्रयाग घूमे। वर्ष 1900 में मुनि की रेती, ऋषिकेश में स्वामी पूर्णानन्द से संन्यास की दीक्षा ली। गुरु ने कालूराम को स्वामी कल्याणदेव नाम दिया। घर त्यागने के बाद वे कभी अपने गांव नहीं गए और न जीवन में माता-पिता से मिले। स्वामी जी ने अपने जीवन का उद्देश्य शिक्षा को बना लिया और पूरी तत्परता से स्कूल, कॉलेजों की स्थापना के कार्य में लग गए। स्वामी जी कहा करते थे कि यदि गरीब शिक्षित होगा, जागरूक होगा और अपने पैरो पर खड़ा होगा तो उसे कभी किसी के पास मदद मांगने नहीं जाना पड़ेगा, उसका कोई शोषण नही कर पायेगा। स्वामी जी अपने जीवन काल में सदा गरीब व जरूरतमंदों की मदद किया करते थे। वे कहा करते थे कि अपनी जरूरत कम करों और जरूरतमंदों की हर संभव मदद करो। परोपकार व मानव सेवा को ही वे परमात्मा की सच्ची ईबादत मानते थे।
वह अपने जीवन काल मे सदा पैदल ही सफर किया करते थे। वे कहते थे कि रिक्शा के माध्यम से आदमी आदमी को खींचता है। यह पाप है। वह सत्य और त्याग के प्रतिमूर्ति थे, वे कहा करते थे कि सब में रब बसता है। लोक कल्याण ही परमात्मा की सच्ची उपासना है। स्वामी जी ख्याति, प्रशंसा, कीर्ति और पद की महत्वकांक्षा से यथा सम्भव दूर रहकर व्यक्तिगत सुख-सुविधा को तिलांजलि देकर लोभ, मोह और स्वार्थ के सहज आकर्षण को त्याग कर अति सरल और अत्यन्त सात्विक जीवन व्यतीत करते थे।




