वाराणसी

ऑल इंडिया यूनाइटेड विश्वकर्मा शिल्पकार महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक कुमार विश्वकर्मा ने नाग पंचमी पर्व पर देशवासियों को शुभकामनाएं देते हुए कहा है कि श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाया जाने वाला नाग पंचमी का पर्व प्रकृति, और जीवों के प्रति सम्मान का प्रतीक है। इस दिन प्रमुख रूप से अनंत,वासुकी,तक्षक, पद्मनाभ, कंबाल शंखपाल,धृतराष्ट्र, शेषनाग और कालिया समेत नौ नाग देवताओं की विधि विधान से पूजा की जाती है। महाभारत काल में राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के डसने से हुई थी। इसका बदला लेने के लिए उनके पुत्र राजा जनमेजय ने संसार के सभी नागों को नष्ट करने के लिए ‘सर्प सत्र’ नामक विशाल यज्ञ किया। यज्ञ की अग्नि में जलने से नागों की रक्षा महर्षि जरत्कारू और मानसा देवी के पुत्र आस्तिक मुनि ने की थी। आस्तिक मुनि ने श्रावण शुक्ल पंचमी के दिन ही राजा जनमेजय का यज्ञ रुकवाया था, जिससे नाग वंश की रक्षा हुई। द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने यमुना नदी के जल को दूषित करने वाले कालिया नाग का अहंकार तोड़कर उसका वध करने के बजाय उसे जीवनदान दिया और यमुना को नाग-मुक्त किया। भगवान शिव ने नागों को अपने गले में आभूषण के रूप में स्थान दिया है, इसलिए सावन मास में शिव आराधना के साथ नाग पूजा का भी विशेष महत्व माना गया है। प्राचीन काल से ही सांपों को किसानों का मित्र माना गया है। खेतों में फसल को नुकसान पहुँचाने वाले चूहों और कीटों को नाग खाकर नष्ट करते हैं, जिससे अन्न की रक्षा होती है। यह पर्व हमें सिखाता है कि प्रकृति के हर जीव, चाहे वह कितना भी भयानक क्यों न हो, उनका पर्यावरण संतुलन में विशेष योगदान है। नाग पंचमी के पर्व पर नाग देवता और भगवान शिव की पूजा की जाती है। इस दिन लोग घरों में नागों के चित्र और मिट्टी से बनीं मूर्तियां स्थापित कर दूध, अक्षत और फूल अर्पित कर पूजा करते हैं और परिवार की रक्षा की कामना करते हैं।












