वाराणसी

सावन का महीना मन की उड़ान और भावनाओं का उत्सव तथा प्रकृति और प्रेम का अद्भुत मिलन है। सावन का परंपरागत झूला खुशी और उमंग का प्रतीक हैं। भारतीय जीवन दर्शन में जीवन का लक्ष्य परम आनंद को प्राप्त करने का रहा है और यह परम आनंद स्वयं पाने का नहीं, दूसरों को देने का भी है, तभी आपका आनंद सार्थक है। यही कारण है कि अनेकानेक पर्व भारतीय जीवन पद्धति में शामिल हैं।
सावन का महीना आते ही जब आसमान हरियाली से भीगता है, धरती को नम हवाएं चूमती हैं तो प्रकृति के रंग को देख भारतीय नारी के मन में एक ही आकांक्षा सिर उठाती है।
आई सावन की बहार झूला पड़े डार डार
घटा छाई है गगन घनघोर
सखियां झूल रही झकझोर
झीनी झीनी है फुहार भीगा जाए रे सिंगार
करे दादुर पपीहा सोर
देखा जाए तो झूला हमारे जीवन में उस नृत्य की तरह है जो नीरसता में रस घोलता है और स्थिरता में गति का अनुभव कराता है। यह केवल डोरी और लकड़ी का बना एक साधन नहीं, यह वह भावात्मक झोंका है, जो प्रेम, स्मृति, विरह और भक्ति सब कुछ एक साथ बांध देता है।
सावन की हरियाली में जब पत्तों से लेकर हवाएं तक प्रेम में डूबी होती हैं, तब उसी मौसम में कोई एक स्त्री ऐसी भी होती है, जिसके लिए झूला प्रतीक्षा का राग बन जाता है। जहां झूला विरह का सोपान बन जाता है। मनभावन सावन में जब प्रिय दूर हो, तब झूले की हर पींग में कोई न कोई स्मृति झूलती है-
‘बदरा गरजे बुंदिया बरसे, आए न एको संदेश
झूला हमे के झुलाई, गुईयां पिया बसे परदेस’
यह स्मृतियां उसे बचपन तक खींच ले जाती हैं जहां मायके का सुख था, मां की प्यारी गोद थी, भाई के साथ निर्मल झगड़े थे, गुड़िया थीं, सखी- सहेलियां थीं, खिलखिलाहटें थीं-
नन्ही नन्ही बुंदिया रे सावन का मोरा झूलना
एक झूला डाला मैंने अम्मा जी के बाग में
हरी हरी चूड़ियां रे सावन का मेरा झूलना
एक झूला डाला मैंने बाबा जी के बाग में
हरी हरी चुनरी रे सावन का मेरा झूलना
एक झूला डाला मैंने भइया जी के बाग में
हरी हरी मेहंदी रे सावन का मेरा झूलना।
इसलिए झूला झूलने की परंपरा का खास वैशिष्ट्य है। यह केवल सावन का खेल नहीं, यह उन सभी महीनों की मौन गवाही है, जिन्हें वह स्त्री जीती है। झूला जिस पर बैठकर वह केवल देह नहीं, भावनाओं को झुलाती है, इसलिए जब भारतीय स्त्री झूले पर बैठती है तो वह केवल बचपन नहीं दोहराती, बल्कि जीवन की सबसे भीतर की अनुभूति को शब्द और गति देती है। झूला उसके लिए उत्सव नहीं वह जगह है जहां स्मृति, प्रतीक्षा और प्रेम की लीला एक साथ झूलती हैं। झूले की सांस्कृतिक व्यापकता अद्भुत है। भारत के अनेक प्रांतों में झूले के साथ जुड़ी हुई विभिन्न लोक परंपराएं हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार में महिलाएं तीज, कजरी, झूला और हरियाली जैसे पर्वों में झूले डालती हैं और गीत गाती हैं। राजस्थान में झूले का पर्व हरियाली तीज से जुड़ा है, जहां साज-शृंगार और मेहंदी गीत स्त्री जीवन के उत्सव बन जाते हैं। मध्य प्रदेश में मालवा क्षेत्र में झूले के साथ फाग, गणगौर और झूलन उत्सव परंपरागत रूप से मनाए जाते हैं। इन सभी में एक बात समान है झूले को केंद्र बनाकर स्त्रियों की सामूहिकता, हंसी, गीत और स्मृति का आदान-प्रदान। झूला उस आदि स्मृति का भी प्रतिनिधित्व करता है, जहां शिशु अपने जीवन का पहला झूला मां की गोद में पाता है।
भारतीय घरों में लकड़ी के पालने झूले का ही रूप हैं जो प्रेम, सुरक्षा और ममता का पहला अनुभव बनते हैं। झूला मां की गोद की तरह झूलता है कभी तेज, कभी धीमा और हर बार आत्मा को एक नई लोरी सुनाता है। यदि गहराई से देखें तो झूला स्वयं भारतीय जीवन-दर्शन का प्रतीक बन जाता है। जीवन की गति कभी ऊपर, कभी नीचे झूले की ही भांति है लेकिन जिस तरह झूला अपनी डोरी से बंधा होकर भी स्वतंत्रता महसूस करता है उसी तरह भारतीय जीवन में भी बंधन के भीतर मुक्त रहने का भाव है। अब समय बदला है और झूले बहुत कम हो गए हैं। महानगरों में तो क्या छोटे शहरों में भी सावन की पीगें अब पार्कों में पड़े झूलों पर ही लग सकती हैं। समय बदल रहा है और उसके साथ बहुत सी परंपराएं भी, लेकिन यह लोगों को सोचना होगा कि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक परंपराओं के पास उन्हें जाना होगा..झूला केवल दो रस्सियों में फंसा पाटा नहीं है। झूला मन की उड़ान है, उमंगों की छलांग है!
सखा संग झूलत गोपियां
वृंदावन में ग्वाल बाल गोपिकाओं के साथ झूला झूलते राधा और कन्हैया के प्रसंगों से संगीत और साहित्य आप्लावित है। कृष्ण की सहजता ही उन्हें पाने में सहायक है। इसीलिए कृष्ण सबके सखा हैं, सबके साथ झूला भी झूलते हैं और रास भी रचाते हैं। बाल गोपाल की छवि के साथ जो सबसे मधुर दृश्य उभरता है, वह है कदंब के वृक्ष पर कान्हा को झूले पर झुलाते ग्वाल-बाल और गोपियां या फिर राधारानी को झुलाते मनमोहन। परमानंद का यह प्रसंग भक्ति की चरम अवस्था मानी गई है। कान्हा, राधारानी, बाल-ग्वाल, गोपिकाओं के झूलने के इस दृश्य का संतों, कृष्ण भक्तों एवं कलाकारों ने इस प्रकार बखान किया है-
झूला धीरे से झुलाओ बनवारी अरे सांवरिया
झूला झूलत मोरा जियरा डरत है
लचके कदंबिया की डारी
अगल बगल दुई सखियां झूले
बीचवा मां झूले राधा रानी
झूले के त्योहार को झूलन उत्सव के रूप में हरिद्वार, वृंदावन, मथुरा और भारत के तमाम मंदिरों में मनाया जाता है। यहां कान्हा को चांदी, सोने, फूलों या रेशमी वस्त्रों से सजे झूलों में बैठाकर भक्तगण झुलाते हैं, झांकी सजाते हैं और गीत गाते हैं। यह झूला भक्ति, समर्पण और जीवन की लीला का प्रतीक बन जाता है।




